कैसे भुला दूं उस धरा को जहाँ भीषण रक्त बहा हो,
क्या शत्रु क्या मित्र समझ कर जहाँ विश्वाश जला हो,
विराट समय की अविरल धारा में जिसने ये सब झेला हो,
आखिर क्यों कह दूं कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।
सत्य हमेंशा एक होता है,और असत्य अनेक,
जिसे कह ना सकें ऐसे दर्द भी देखे हैं,
उन लम्हों को भी जिया है जहां सिर्फ असत्य होते थे।
Wednesday, 19 September 2018
The Only Truth
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
ملیحہ مصافر कठोर मुसाफ़िर (मिनी सिरीज़)
मलीहा मुसाफ़िर एपिसोड -१ जीवन काल के सीमित चक्र में मानव बाल्यकाल से लेकर अपने अंतिम क्षणों तक कुछ न कुछ सीखता ही रहता है,और खुद को हर तरह क...
-
कुछ मुरझाए गुलाब की पंखुड़ियों की ही तरह, कुछ अजीब सी लगने लगी है जिंदगी, अब इन मुलायम पंखुड़ियों की कोई जगह नहीं, ज़िन्दगी और भी बहुत कुछ ह...
-
मलीहा मुसाफ़िर एपिसोड -१ जीवन काल के सीमित चक्र में मानव बाल्यकाल से लेकर अपने अंतिम क्षणों तक कुछ न कुछ सीखता ही रहता है,और खुद को हर तरह क...
-
(पोस्टर में उक्त तस्वीर स्वयं अनुराग यादव द्वारा खींची गई है,अगर आप रायगढ़ से हैं तो इस जगह को जरूर पहचानें।) बेनाम रास्ते भाग-...
No comments:
Post a Comment